जब ओमप्रकाश बोले, ‘मैं उल्लू बन गया’

पिछले 50 सालों से इस फ़िल्म ने कल्ट स्टेटस अख़्तियार कर लिया है.

फ़िल्म की कहानी उपेंद्रनाथ गांगुली ने लिखी थी और फ़िल्म की सफलता में स्क्रीनप्ले का बहुत कमाल है जिसे गुलज़ार और डीएन मुखर्जी ने लिखा था.

फ़िल्म के गाने काफ़ी मधुर हैं, जिसमें संगीत एसडी बर्मन का था और गीत आनंद बख़्शी ने लिखे थे.

वैसे ये फ़िल्म पहले 1971 में छदमबेशी नाम से बांग्ला में बन चुकी थी, जिसमें उत्तम कुमार और माधवी मुखर्जी थे.

चुपके चुपके आपको ख़ूब हँसाती है, मनोरंजन करती है और हँसी मज़ाक में ये भी सिखाती है कि विचारधारा को लेकर अड़ियल होने से अक्सर ही अव्यवहारिक और हास्यास्पद नतीजे सामने आते हैं.

जैसा कि फ़िल्म के आख़िर में ओम प्रकाश दर्शकों से मुखातिब होकर कहते हैं, “इस उम्र में जो बेइज़्ज़ती होनी थी, वो तो हो गई मगर आप जनता जनार्दन हैं, बाहर जाकर किसी से मत कहिएगा कि मैं उल्लू बन गया. नमस्ते.”

जब ट्रंक कॉल पर बात करते – करते फ़ोन कॉल बीच में ही कटने पर चिढ़े हुए असरानी बोलते हैं, ‘ये टेलीफ़ोन वाले भी न. इनको सुधारने का एक ही तरीक़ा है मीसा.’

मीसा वो विवादित क़ानून है, जो 1971 में पारित किया गया था, जिसके तहत क़ानून व्यवस्था बनाये रखने वाली संस्थाओं को बहुत अधिक अधिकार दिये गये थे. इमरजेंसी के दौरान ये ख़ूब चर्चा में आया.

चुपके चुपके का एक और सीन है, जब कॉलेज छात्राएँ चौकीदार को सामान उठाने के लिए कहती हैं.

ऐसे में शर्मिला टैगोर टोकते हुए कहती हैं कि चौकीदार बेचारा अकेला कैसे उठाएगा. और उनकी सहेलियाँ चिढ़ाते हुए कहती हैं, ‘लो आई अपनी कम्युनिस्ट.’

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