ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्मों की एक ख़ासियत रही है कि इनमें कई सारे छोटे-बड़े किरदार होते हैं. चुपके चुपके में भी धर्मेंद्र-शर्मिला टैगौर के अलावा डेविड, ओम प्रकाश, अमिताभ बच्चन, जया भादुड़ी, असरानी, केष्टो मुखर्जी, लिली चक्रवर्ती और उषा किरण है.
सब किरदारों को सलीके से कहानी में जगह देना ऋशिकेश मुखर्जी की फ़िल्मों को ख़ास बनाता है.
जब चुपके चुपके रिलीज़ हुई तो अमिताभ बच्चन को लोग एंग्री यंग मैन के तौर पर जानने लगे थे.
धर्मेंद्र भी अनुपमा, सत्यकाम जैसी फ़िल्मों में हुनर दिखा चुके थे, लेकिन कॉमेडी में उनका कमाल लोगों ने कम ही देखा था.
ऐसे साल में जब दोनों शोले में दिखाए दिए, उसी साल में ऋषिकेश मुखर्जी ने धर्मेंद्र और अमिताभ को ज़बरदस्त कॉमिक अंदाज़ में पेश किया.
कॉमेडी में ये शायद धर्मेंद्र की सबसे बेहतरीन फ़िल्मों में से एक थी. बहुत कम निर्देशकों ने धर्मेंद्र की इस कॉमिक टाइमिंग का इस्तेमाल किया और उनकी पहचान ही-मैन की ही रही.
चुपके चुपके के बेहतरीन दृश्यों में से एक है धर्मेंद्र यानी बॉटनी प्रोफ़सर त्रिपाठी और अमिताभ यानी अंग्रेज़ी के प्रोफेसर सुकुमार की जुगलबंदी.
दिक़्क़त ये है कि अंग्रेज़ी के प्रोफ़ेसर अमिताभ बच्चन को जया भादुड़ी (वसुधा) से प्यार हो जाता है, लेकिन अमिताभ को शर्मिला टैगोर के पति का नाटक करना पड़ता है.
प्यार का इज़हार न कर पाने से परेशान अमिताभ बच्चन कहते हैं, “मैं वसुधा (जया भादुड़ी) को पढ़ाने जाता हूँ, मैं बन के नहीं तुम (धर्मेंद्र) बनके. तुम बनके जो कहता हूँ वो समझती हैं कि मैं कह रहा हूँ. कहता मैं ही हूँ..लेकिन वो मैं जो तुम हो और जो तुम हो वो मैं हूँ.”
फ़िल्म के आख़िर में ओमप्रकाश को समझ में आता है कि भाषा के चक्कर में वे बेवकूफ़ बन गए. और शुद्ध हिंदी बोलने वाला उनका ड्राइवर, दरअसल बॉटनी का प्रोफ़ेसर है.