मीसा, कम्युनिस्ट और राजनीतिक व्यंग्य

वैसे तो ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्में सरल और सादी दिखती हैं, लेकिन अगर उनमें छिपे प्रतीकों को पढ़ा जाए तो बहुत सारे मायने निकलते हैं और उस समय के राजनीतिक-सामाजिक स्थितियों का पता भी चलता है.

जब ट्रंक कॉल पर बात करते – करते फ़ोन कॉल बीच में ही कटने पर चिढ़े हुए असरानी बोलते हैं, ‘ये टेलीफ़ोन वाले भी न. इनको सुधारने का एक ही तरीक़ा है मीसा.’

मीसा वो विवादित क़ानून है, जो 1971 में पारित किया गया था, जिसके तहत क़ानून व्यवस्था बनाये रखने वाली संस्थाओं को बहुत अधिक अधिकार दिये गये थे. इमरजेंसी के दौरान ये ख़ूब चर्चा में आया.

चुपके चुपके का एक और सीन है, जब कॉलेज छात्राएँ चौकीदार को सामान उठाने के लिए कहती हैं.

ऐसे में शर्मिला टैगोर टोकते हुए कहती हैं कि चौकीदार बेचारा अकेला कैसे उठाएगा. और उनकी सहेलियाँ चिढ़ाते हुए कहती हैं, ‘लो आई अपनी कम्युनिस्ट.’

बहुत ही महीन तरीक़े से ऋषिकेश मुखर्जी मध्यवर्गीय सामाजिक ताने-बाने को भी दर्शाते हैं.

जब शर्मिला टैगोर अपने ड्राइवर (धर्मेंद्र) के साथ गाड़ी में आगे बैठ कर जाती है, तो ये घर में चर्चा का विषय बन जाता है, क्योंकि समाज में अनकहा सा नियम है कि मालिक या मालकिन हमेशा पीछे बैठते हैं.

मज़ाक मज़ाक में ही सही, जब एक लड़की (शर्मीला टैगोर) घर के ड्राइवर (धर्मेंद्र) के साथ भाग जाती है, तो ये बात एक मध्यवर्गीय परिवार को उलट पुलट कर रख देती है.

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