आज के दौर में भाषा को लेकर कई तरह के विवाद सामने आए हैं.
ऐसे में ये फ़िल्म दर्शाती है कि कोई भी भाषा बड़ी या छोटी नहीं होती, वो बस आपस में संवाद करने का ज़रिया होती है.
आज के माहौल में देखें तो लगता है कि कितने सहज और हल्के फुल्के अंदाज़ में फ़िल्म एक संदेश दे जाती है.
चुपके चुपके की कई बातें ताज़ा हवा के झोंके की तरह थीं.
मसलन धर्मेंद्र और शर्मिला टैगोर का रोमांस. किसी कारणवश प्रोफेसर परिमल यानी धर्मेंद्र चौकीदार बनने का नाटक कर रहे हैं, जिसे शर्मिला टैगोर पकड़ लेती हैं.
शर्मिला टैगौर टिप के बहाने एक चिट चौकीदार यानी धर्मेंद्र को देती हैं, जिसमें वो चुपके चुपके अपना पता भी दे देती हैं.
70 के दौर में बन रही फ़िल्मों में ऐसा कम ही दिखाया जाता था, जब रिश्ते में पहल या प्रस्ताव लड़की की तरफ़ से आए.
पूरी फ़िल्म की अफ़रा-तफ़री में ये छोटा सा किस्सा दब सा जाता है, लेकिन ये है बहुत अहम.